आईआईटी रिसर्च: एंटी-वायरल मोलेक्यूल से कोविड 19 के इलाज को नई दिशा

नई दिल्ली | आईआईटी रुड़की के शोधकर्ताओं ने कोविड-19 संक्रमण के इलाज में कारगर एंटी-वायरल मोलेक्यूल की पहचान की है। शोधकर्ताओं ने पहले से प्रचलित दवा को रीपर्पस कर और कम्प्यूटेशन एवं एंटीवायरल प्रायोगिक अध्ययन कर तीन एंटीवायरल मोलेक्यूल की पहचान की है। इस रिसर्च का प्रकाशन प्रसिद्ध पीयर- रिव्यू जर्नल वायरोलॉजी में किया गया।

इन अध्ययनों की एक बड़ी उपलब्धि प्रोटीन डेटा बैंक है जो प्रोटीनों और वायरसों की संरचनाओं का भंडार है। पूरी दुनिया के शोधकर्ता इस पीडीबी डेटाबैंक का उपयोग कर दवा खोजते हैं। आईआईटी रुड़की की टीम सार्स- सीओवी 2 मोलेक्यूल्स पर प्रोटीन संरचना - आधारित दवा रीपर्पस कर शोध कर रही है, ताकि इसका क्लिनिकल आकलन किया जाए और फिर एंटीवायरल उपचार में उपयोग हो पाए।

आईआईटी रुड़की के निदेशक प्रोफेसर के. के. पंत ने इस तरह के शोध को बहुत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, सार्स सीओवी 2 वायरस पर इस तरह का शोध न केवल कोविड- 19 महामारी बल्कि नए वैरियंट से निपटने और भविष्य के लिए तैयार रहने में भी महत्वपूर्ण है। इस शोध के माध्यम से वैज्ञानिक समुदाय को इस तरह के वायरस को बेहतर समझने और कारगर वैक्सीन तैयार करने में मदद मिलेगी।

आईआईटी रुड़की टीम ने कोविड-19 वायरस को टार्गेट करने और दवा के मोलेक्यूल की पहचान करने के लिए प्रोटीन डेटा बैंक का उपयोग किया। टीम ने वायरल प्रोटीन के खास हिस्से न्यूक्लियोटाइड-बाइंडिंग पॉकेट्स (एनबीपी) पर कारगर मोलेक्यूल की खोज पर ध्यान केंद्रित किया। एनबीपी के नाम से जाहिर है कि यह न्यूक्लियोटाइड्स से जुड़ जाता है जो कि आरएनए और डीएनए का बुनियादी निर्माण करता है और वायरस को रेप्लिकेट करने में मदद करता है। एनबीपी को टार्गेट करने वाली दवाएं पहले से ज्ञात हैं और वायरस की अन्य बीमारियों जैसे एचआईवी, हेपेटाइटिस बी, हेपेटाइटिस सी और हर्पिस आदि में उनका उपयोग होता है।

शोध टीम की मार्गदर्शन बायोसाइंसेज और बायोइंजीनियरिंग विभाग की प्रो. शैली तोमर ने किया है। शोध पत्र के सह-लेखक हैं रुचि रानी, सिवेन लॉन्ग, अक्षय पारीक, प्रीति ढाका, अंकुर सिंह, प्रवीन्द्र कुमार, गेराल्ड मैकइनन और प्रो. तोमर हैं।

अपने शोध का लक्ष्य बताते हुए शोध प्रमुख प्रो. शैली तोमर, बायोसाइंसेज एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी रुड़की ने कहा, अन्य बीमारियों में एनबीपी को टार्गेट करने वाले एंटीवायरल सफल रहे हैं। इसलिए हम ने फामार्कोलॉजिकली- एक्टिव कम्पाउंड को रीपर्पस करने का प्रयास किया जो छह सार्स सीओवी - 2 प्रोटीन के एनबीपी से जुड़ जाते हैं।

टीम ने प्रोटीन डाटा बैंक में उपलब्ध परमाणु संरचनाओं के उपयोग से छह एनबीपी की पहचान की। इसके लिए एक अभूतपूर्व रास्ता चुना जो एक दवा से केवल एक वायरस प्रोटीन को टार्गेट करने के बजाय विभिन्न वायरस प्रोटीनों को मल्टी- टार्गेट करना है। इस मल्टी-टार्गेट प्रयोग से इलाज के अधिक कारगर होने की उम्मीद है और इसके परिणामस्वरूप रेसिस्टेंट वैरियंट स्ट्रेन बनने का खतरा भी कम होगा।

शोध टीम ने पहले से स्वीकृत या प्रचलित दवाओं से नए एंटी-सार्स- सीओवी 2 मोलेक्यूल खोजने के मकसद से दवा को रीपर्पस करने की रणनीति अपनाई। दवा विकसित करने के थकाऊ, लंबा समय लेने वाले और महंगे अध्ययन के बिना दवा को रीपर्पस करने पर आधारित मोलेक्यूलर थिरैपी क्लिनिकल ट्रायल के लिए तैयार है। आईआईटी रुड़की की टीम ने दवा को रीपर्पस कर कैंसर की दवा आईएनसी 28060, एंटी-डायबेटिक मोलेक्यूल डार्गलिटाजोन और प्राकृतिक फाइटोकेमिकल कोलम्बियानाडिन की खोज की जिनमें सूजन और कैंसर का प्रभाव कम करने के गुण हैं और जो कोविड- 19 वायरस पर असरदार है।

इस सिलसिले में प्रो. प्रवीन्द्र कुमार, प्रमुख, बायोसाइंसेज ने बताया, हम ने इन मोलेक्यूल की बांइडिंग क्षमताओं के आधार पर चुने हुए मोलेक्यूल को कैरेक्टराइज किया है। इस तरह प्रायोगिक पद्धतियों जैसे कि आइसोथर्मल टाइट्रेशन कैलोरीमेट्री, उनके एब्जॉर्शन, डिस्ट्रिब्यूशन, मेटाबॉलिज्म और एक्सक्रीशन (एडीएमई) गुणों का सिमुलेशन अध्ययन और इसके बाद सेल आधारित एंटीवायरल परीक्षण किया गया।

प्रो. प्रवीन्द्र कुमार ने बताया, हम ने कई प्रोटीनों को टार्गेट करने वाले जिन एंटीवायरल की पहचान की है वे सार्स- सीओवी - 2 और इसके उभरते वैरियंट के लिए एंटीवायरल थिरैपी विकसित करने का मार्गदर्शन करेंगे।

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