खजुराहो में दीवारों से निकलकर मंच पर साकार हुईं नृत्य नायिकाएं

खजुराहो में दीवारों से निकलकर मंच पर साकार हुईं नृत्य नायिकाएं


-खजुराहो नृत्य समारोह की छठवीं शाम, ओजपूर्ण नृत्य प्रस्तुतियों ने मोहा दर्शकों का मन

भोपाल, 25 फरवरी (हि.स.)। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन नगरी खजुराहो में 48वें नृत्य समारोह में कला प्रेमियों को भारतीय कलाओं का उदात्त और अद्भुत स्वरूप देखने को मिल रहा है। समारोह के छठवें दिन फागुन के रंग में उजली शाम में कंदरिया महादेव और जगदम्बी मंदिरों की आभा के बीचों-बीच बने विस्तीर्ण रंगमंच पर ओजपूर्ण नृत्य प्रतुतियों ने सभी का मन मोह लिया। मंच पर पूरी सज धज के साथ नृत्यांगनाएँ अवतरित हुईं तो लगा खजुराहो के मंदिरों की दीवारों पर उत्कीर्ण नायिकाएं दीवारों की कैद से आज़ाद होकर नृत्यरत हो उठी हो। देविका से लेकर रुद्राक्ष फाउंडेशन और नयनिका घोष तक सभी प्रस्तुतियां लाजवाब रहीं।

48वें खजुराहो नृत्य महोत्सव के छठवें दिन शुक्रवार की शाम का आगाज़ ट्रांसजेंडर नृत्यांगना देविका देवेंद्र एस मंगलामुखी के कथक नृत्य से हुई। जयपुर घराने से ताल्लुक रखने वाली देविका ने चलन से थोड़ा परे जाकर मुगलिया शैली में कथक की प्रस्तुति दी। "शाम ए रक़्स" नाम की पेशकस में उन्होंने प्रख्यात सूफी गायक खुसरो के कलाम "या रे मन बया बया" पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। इसके बाद उन्होंने सरगम के अंग में सलाम की प्रस्तुति दी। सलाम मुगल दरबारों में किये जाने वाले कथक का एक खास अंग रहा है, जो तिस्त्र जाति में था।

अगली पेशकश में देविका में तीनताल में पारंपरिक शुद्ध नृत्य किया। उन्होंने उठान, ठाट, टुकड़े विविध परनें और सवाल जवाब की सूरत में तत्कार पेश की। नृत्य का समापन उन्होंने बड़े गुलाम अली साहब की प्रसिद्ध ठुमरी "याद पिया की आये" पर अभिनय नृत्य से किया। कहरवा की विलंबित से द्रुत होती लय पर उन्होंने नृत भाव से कई रंग भरे और बिखेर दिए। उनके साथ सारंगी पर जनाब अमीरुद्दीन खान, तबले पर मोहित दुबे, गायन पर शभानु कुमार राव और सितार पर रेखा खत्री ने बखूबी साथ देकर प्रस्तुतियों को यादगार बनाया।

समारोह में शाम की दूसरी प्रस्तुति में भुवनेश्वर के रुद्राक्ष फाउंडेशन के कलाकारों ने ओडिसी नृत्य के वैभव के दर्शन कराए। प्रसिद्ध ओडिसी नर्तक विचित्रनन्द स्वैन के शिष्यों में शुमार यज्ञदत्त प्रधान दिशानन साहू, विचित्र बेहरा, संतोष राम, समीर पाणिग्रही, सुरेंद्र प्रधान, संजीव कुमार जैन और रस्मरंजन ने समूह नृत्य की शानदार प्रस्तुति दी। पहली प्रस्तुति में कृष्ण और काली को नृतभावों में पिरोते हुए नर्तकों ने बताया कि कृष्ण काली में कोई भेद नहीं है, वे एक ही हैं। इसी क्रम में अगली प्रस्तुति महाभारत से थी। चक्रव्यूह नाम की इस प्रस्तुति में अभिमन्यु के शौर्य पराक्रम और कौरवों की कुटिल चालों को नृतभावों में पेश किया। राग और ताल मालिका में निबद्ध इन प्रस्तुतियों में संगीत रामहरि का और रिदम धनेश्वर का था।

कार्यक्रम का समापन नयनिका घोष के कथक नृत्य से हुआ। उन्होंने अपने नृत्य का आगाज़ शिव की वंदना से किया। राग योग के सुरों और आड़ा चौताल की बंदिश "शिवशंकर कर डमरू बाजे" पर आपने नृत भावों से शिव के आकार और निराकार दोनों ही स्वरूप को पेश किया। यह रचना उन्होंने कथक महाराज स्व. बिरजू महाराज को समर्पित की। अगली प्रस्तुति शुद्ध नृत्य की रही। इसमें त्रिताल में उठान, परन, परन आमद, तोड़े, टुकड़े परमेलु की प्रस्तुति दी।

उन्होंने बिरजू महाराज द्वारा रचित एवं कंपोज की गई खमाज की ठुमरी - "ऐरी सखी का से कहूं" एवं सूफियाना ठुमरी "ऐरी सखी मोसे" पर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। अंत में तराने के साथ उन्होंने नृत्य का समापन किया। तबले पर अंशुल प्रताप सिंह, पखावज पर आशीष गंगानी, सितार पर अम्बरीष गंगराड़े, सारंगी पर सलमान खान और गायन पर सुहैल हसन ने साथ दिया।

हिन्दुस्थान समाचार / मुकेश

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