दीया टिमटिमा रहा है...

ध्रुव गुप्त

कार्तिक कृष्णपक्ष की त्रयोदशी या तेरस से आरंभ होने वाला पांच दिनों का प्रकाश-पर्व भारतीय संस्कृति की पांच बड़ी घटनाओं का पांच-दिवसीय उत्सव है। ये पांच दिन-रात ऐसे हैं जिनमें हमारी उत्सवधर्मिता ही नहीं, हमारी  व्यापक जीवन-दृष्टि की जड़ें भी तलाशी जा सकती हैं। इस आयोजन का पहला दिन उस घटना की स्मृति है जब समुद्र मंथन के अपने संयुक्त अभियान के दौरान देवों और असुरों ने समुद्र पार के किसी देश में अमृत घट के साथ आयुर्वेद के जन्मदाता धन्वंतरि की खोज की थी। चिकित्सा विज्ञान में पारंगत धन्वंतरि को देवों ने अपना चिकित्सक बनाया। चिकित्सा में उनकी विशेषज्ञता कुछ ऐसी थी  कि उन्हें भगवान विष्णु का अवतार तक घोषित किया गया। हजारों वर्षों से इस दिन को  आयुर्वेद को समर्पित धन्वंतरि त्रयोदशी, धन्वन्तरि जयंती या धनतेरस के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाता रहा है। शास्त्रों का विश्वास है कि इस दिन संध्या समय धन्वंतरि को याद कर यम को दीपदान करने से अकाल मृत्यु से सुरक्षा मिलती है। आधुनिक समय में यह पर्व  विकृतियों का शिकार होकर अपना उद्देश्य खो चुका है। धनतेरस का वर्तमान स्वरुप बाजार और उपभोक्तावाद की देन है जब हमारी धनलिप्सा ने एक महान चिकित्सक को धन का देवता बना दिया। बाजार ने हमें बताया कि धनतेरस के दिन सोने-चांदी या सट्टे में निवेश करने, विलासिता के महंगे सामान खरीदने या जुआ खेलने से धन तेरह गुना तक बढ़ जा सकता है। हाल के वर्षों में इसमें एक और अंधविश्वास यह जुड़ा है कि धनतेरस की रात उल्लुओं की बलि देने से संपति में बेतहाशा वृद्धि होती है। उल्लुओं की लगातार बढ़ती बलि के कारण हमारे यहां देवी लक्ष्मी का वाहन मानी जाने वाली पक्षियों की इस प्रजाति के नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो गया है। 
दीपोत्सव के दूसरे दिन को नरक चतुर्दशी या छोटी दीवाली के रूप में मनाया जाता है। इसे रूप चतुर्दशी भी कहा जाता है। इस उत्सव की पृष्ठभूमि में यह पौराणिक कथा है कि प्राग्ज्योतिषपुर के शक्तिशाली असुर सम्राट नरकासुर ने देवराज इन्द्र को पराजित करने के बाद देवताओं तथा ऋषियों की सोलह हजार से ज्यादा कन्याओं का अपहरण कर उन्हें अपने रनिवास में रखा था। नरकासुर को किसी देवता अथवा पुरूष से अजेय होने का वरदान प्राप्त था।  कोई स्त्री ही उसे मार सकती थी। हताश देवता सहायता की याचना लेकर जब कृष्ण के पास पहुंचे तो उनकी  दुर्दशा  और अपने पति की चिंता देखकर कृष्ण की एक पत्नी सत्यभामा सामने आई। कृष्ण के रनिवास की वह एकमात्र योद्धा थी जिनके पास कई युद्धों में भाग लेने का अनुभव था। उन्होंने नरकासुर से युद्ध की चुनौती स्वीकार की। कृष्ण को सारथि बनाकर वीरांगना सत्यभामा युद्ध में उतरीं और नरकासुर को पराजित कर उसे मार डाला। नरकासुर के मरने के बाद उसके रनिवास में बंदी सभी  स्त्रियों को मुक्त करा लिया गया। सत्यभामा और कृष्ण के द्वारका लौटने के बाद घर-घर दीये जलाकर स्त्रियों की मुक्ति का उत्सव मनाया गया। नरकासुर की इसी कथा से जुड़ा कृष्ण की सोलह हजार से ज्यादा पत्नियों का मिथक भी है। जब कैद से मुक्त सोलह हजार से ज्यादा स्त्रियों को कृष्ण ने उनके घर भेजने का प्रयास किया तो नरकासुर के रनिवास में लंबे समय तक रही ज्यादातर औरतों को सामाजिक निंदा के भय से उनके घरवालों ने अपनाने से इंकार कर दिया। कुछ स्त्रियां स्वयं तिरस्कार के भय से भी घर लौटने को तैयार नहीं हुईं। कृष्ण ने इन सभी स्त्रियों को सामाजिक सम्मान और सामान्य जीवन दिलाने के लिए उन्हें अपनी पत्नी का दर्जा दिया। स्त्रियों की मुक्ति का वह उत्सव घरों में दीये जलाकर आज भी मनाया जाता है, मगर इसका अर्थ और सबक हम भूल चुके हैं। उत्सव के साथ यह दिन हमारे लिए खुद से यह सवाल पूछने का अवसर भी है कि क्या उस घटना के हजारों साल बाद भी हम स्त्रियों को अपने भीतर मौजूद वासना और पुरूष-अहंकार जैसे नरकासुरों की कैद से मुक्ति दिला पाए हैं ?
कार्तिक मास की अमावस्या को मनाई जाने वाली दिवाली देश का अकेला पर्व है जिसकी उत्पति के बारे में भारतीय धर्म-संस्कृति में सबसे ज्यादा मत-भिन्नताएं  हैं। ज्यादा लोग इस दिन को लंका विजय कर चौदह वर्षों के बनवास के बाद राम की अयोध्या वापसी के उत्सव के रूप में देखते हैं। कुछ लोग इस दिन को महाभारत युद्ध के बाद विजेता पांडवों के कृष्ण के साथ हस्तिनापुर लौटने की घटना का उत्सव मानते हैं। पूर्वी भारत के बंगाल और उड़ीसा की शक्ति-पूजक संस्कृति दिवाली को काली पूजा के रूप में मनाती है। बौद्धों के लिए यह दिन कलिंग युद्ध के रक्तपात से विचलित सम्राट अशोक के बौद्ध धर्म में दीक्षित होने का दिन है। जैन इसे तीर्थंकर महावीर के निर्वाण दिवस के तौर पर देखते हैं। इतनी मान्यताओं के बीच अजीब यह है कि इस दिन राम, कृष्ण, काली, बुद्ध या महावीर की नहीं, देवी लक्ष्मी और गणेश की पूजा होती रही है। दीवाली की एक कथा देवी लक्ष्मी से भी जुड़ती है। समुंद्र-मंथन में लक्ष्मी के प्रकट होने के बाद उन्हें पाने के लिए देवों और असुरों के बीच विवाद हुआ था। आज ही की रात लक्ष्मी ने पति के रूप में विष्णु का वरण किया था। उसी रात की स्मृति में दीये जलाकर देवी लक्ष्मी की पूजा होती है। इस पूजा में उनके साथ विघ्ननाशक गणेश को भी शामिल किया जाता है। व्यवसायी इस दिन देवी लक्ष्मी की आराधना कर नए बही-खातों का श्रीगणेश करते हैं। आज के बाजारवादी समय में इस पर्व का एक बिल्कुल नया रूप ही सामने आया है। अब यह अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का नहीं, अपने वैभव के भोंडे प्रदर्शन, अराजक आतिशबाजी से पर्यावरण को हानि पहुंचाने, ध्वनि प्रदूषण से बीमारों, बच्चों और छोटे पशु-पक्षियों को आतंकित करने, जुआ-सट्टा खेलने और मौज-मस्ती करने का अवसर भर है।
दीवाली की अगली सुबह मनाया जाने वाला गोवर्द्धन पूजा या अन्नकूट उत्तर भारत के पशुपालकों का सबसे बड़ा पर्व है। हमारी संस्कृति में सदियों से स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध इसे पहले विद्रोह का दिन भी माना जाता है। देवराज इन्द्र की निरंकुश सत्ता के प्रतिरोध में इस पर्व की शुरूआत द्वापर युग में कृष्ण ने की थी। पौराणिक कथा के अनुसार एक बार जब अतिवृष्टि से गोकुल और वृंदावन जलमग्न हो गए तो वहां के  निवासियों ने अपनी और अपने पशुधन की रक्षा के लिए वर्षा के देव इंद्र से गुहार की। इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए वैदिक अनुष्ठानों का लंबा क्रम चला। भरपूर 'हवि' पाने के बाद भी इन्द्र मेहरबान नहीं हुए।  जलप्रलय की स्थिति देखकर कृष्ण ने अहंकारी इंद्र को समर्पित तमाम वैदिक अनुष्ठान बंद करा दिए। उस युग के संदर्भ में देखें तो शक्तिशाली इंद्र को वैदिक काल से चले आ रहे  गौरव से अपदस्थ कर देना स्थापित सत्ता के विरुद्ध किशोर वय के कृष्ण का क्रांतिकारी कदम था। तमाम आशंकाओं के बीच उन्होंने गोकुल और वृन्दावन के लोगों को ऊंगली से गोवर्द्धन पर्वत की ओर चलने का संकेत किया।  उनकी बात मान लोगों ने अपने परिवार, धन-धान्य और पशुओं के साथ गोवर्द्धन पर्वत की शरण लेकर जलप्रलय से अपनी और पशुधन की रक्षा की थी। माना जाता है कि उसी दिन से देवराज इंद्र की पूजा बंद हुई और गोवर्द्धन पर्वत के प्रति कृतज्ञता-ज्ञापन का अनुष्ठान आरम्भ हुआ। इस दिन पशुधन को स्नान कराकर उन्हें रंग लगाकर और उनके गले में नई रस्सी डालकर उन्हें गुड़-चावल खिलाया जाता है। गाय के गोबर से घर-आंगन लीपने के बाद प्रतीकात्मक रूप से गोबर से गोवर्द्धन पर्वत की आकृति बनाकर उसके प्रति श्रद्धा निवेदित की जाती है।
कार्तिक शुक्ल पक्ष की दूसरी तिथि यम द्वितीया दीपोत्सव के पांच-दिवसीय आयोजन की आखिरी कड़ी है। लोक भाषा में इस दिन को भैया दूज कहा जाता है। दीपोत्सव का यह दिन भाई-बहनों के आत्मीय रिश्ते के नाम समर्पित है। जहां रक्षा बंधन या राखी सभी उम्र की बहनों के लिए निर्धारित है, भैया दूज की कल्पना मूलतः विवाहित बहनों की भावनाओं को ध्यान में रखकर की गई है। इस दिन भाई बहनों की ससुराल जाकर उनका आतिथ्य स्वीकार करते हैं और बहनें उनकी लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं। हमारी संस्कृति में किसी भी रीति-रिवाज या रिश्ते को स्थायित्व देने के लिए उसे धर्म और मिथकों से  जोड़ने की परंपरा रही है। यम द्वितीया के लिए भी पुराणों ने एक मार्मिक कथा गढ़ी है। इस कथा के अनुसार सूर्य के पुत्र और मृत्यु के देवता यमराज का अपनी बहन यमुना से अपार स्नेह था। यमुना के ब्याह के बाद स्थितियां कुछ ऐसी बनीं कि लंबे अरसे तक भाई और बहन की भेंट नहीं हो सकी। यमुना के निरंतर निवेदन के बाद यम अंततः कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को बहन के घर पहुंच ही गए। यमुना ने दिल खोलकर भाई की सेवा की। प्रस्थान के समय स्नेह और सत्कार से अभिभूत यम ने बहन से वरदान मांगने को कहा। यमुना ने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने दुनिया की तमाम बहनों के लिए यह वर मांग लिया कि आज के दिन जो भाई अपनी बहन की ससुराल जाकर यमुना के जल या बहन के घर में ही स्नान कर उसके हाथों से बना भोजन ग्रहण करे, उसे यमलोक का मुंह  नहीं देखना पड़े। यम और यमुना की यह पौराणिक कथा काल्पनिक सही, लेकिन इसमें अंतर्निहित भावनाएं काल्पनिक नहीं है। इस कथा के पीछे हमारे पूर्वजों का उद्देश्य निश्चित रूप से यह रहा होगा कि भैया दूज के बहाने ही सही, भाई साल में कम से कम एक बार बहन की ससुराल जाकर उससे जरूर मिलें। भाई दूज के दिन विवाहित स्त्रियों द्वारा गोधन कूटने की प्रथा भी है। गोबर की मानव मूर्ति बनाकर  उसे मूसलों से तोड़तने के बाद वे यम और यमुना की पूजा करती हैं। संध्या के समय यम के नाम से दीप जलाकर घर के बाहर रख दिया जाता है। यदि उस समय आसमान में कोई चील उड़ता दिखाई दे तो माना जाता है कि भाई की लंबी उम्र के लिए बहन की प्रार्थना स्वीकार हो गई है। जैसा कि हर पर्व के साथ होता आया है, कालांतर में  अन्य पर्वों की तरह भैया दूज के साथ भी पूजा-विधि के बहुत सारे कर्मकांड जुड़ते चले गए, लेकिन इन्हें नजरअंदाज करके देखें तो लोक जीवन की सादगी और निश्छलता के प्रतीक इस पर्व की भावनात्मक परंपरा सदियों तक संजोकर रखने लायक है।
'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का संदेश लेकर आने वाले प्रकाश-पर्व का एक आर्थिक पक्ष भी है जिसे हम विस्मृत करते जा रहे हैं।  हमारे पूर्वजों ने  किसी भी धार्मिक या लोकपर्व की परिकल्पना करते समय गांवों के कारीगरों, शिल्पियों और कृषकों की रोज़ी-रोटी और सम्मान का पूरा-पूरा ख्याल रखा था। उनके उत्पादों के बिना कोई भी पूजा सफल नहीं मानी जाती थी। हमारे लाखों कुम्भकार और शिल्पी अपने बनाए दीयों, मूर्तियों, सजावट के सामानों और कलाकृतियों के साथ बरस भर प्रकाश पर्व की बाट जोहते हैं।  औद्योगीकरण के दौर में आज वे  लगभग हाशिए पर खड़े हैं।  उनकी रोज़ी-रोटी पिछले कई सालों से साम्राज्यववादी चीन और बड़े औधोगिक घरानों  की आक्रामक बाज़ारवादी नीतियों ने लगभग छीन रखी है। अपने शहर के  बाज़ार की सैर पर निकलें तो ऐसा लगेगा कि हम अपने भारत नहीं, चीन के किसी आर्थिक उपनिवेश की सैर पर हैं। देश के कुटीर उद्योगों की बिगड़ती सूरत के कारण लगभग बर्बादी के कग़ार पर खड़े अपने लाखों शिल्पकारों को सहारा देने के लिए हमें आगे आना होगा। अपनी ज़रा सी संवेदनशीलता से हम उनके उदास घरों में रोशनी और  बेनूर चेहरों पर मुस्कान लौटा सकते हैं।  आईए इस प्रकाश-पर्व में अपने घरों में हम मिट्टी के दीये जलाएं ! पूजा-कक्ष में अपने  कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्तियों को जगह दें। बच्चों के लिए मिट्टी और लकड़ी के खिलौने खरीदें ! सजावट की ख़ातिर अपने कलाकारों द्वारा निर्मित हस्तकलाओं और कलाकृतियों का प्रयोग करें। विदेशी उत्पादों की तुलना में  वे शायद थोड़े महंगे पड़ेंगे, लेकिन अपने ही देश के लाखों लोगों की खुशियों के आगे यह थोड़ी-सी ज्यादा क़ीमत कुछ भी नहीं। क्या पता हमारे छोटे-छोटे सहयोग से उनके कुछ बड़े-बड़े सपने पूरे हो जायं !

(लेखक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं)

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