भाजपा के समीकरण से सीखा ओमप्रकाश राजभर ने, अब खेला ये दांव

लखनऊ। भागीदारी संकल्प मोर्चा के संयोजक सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर को राजभर, खंगार, अर्कवंशी समुदाय की राजनीति के लिए जाना जाता है। इस मोर्चा के अन्य सियासी दल भी कमोबेश समुदाय विशेष के वोटों पर ही अपना अधिकार जताते हैं।विकासशील इन्सान पार्टी (वीआईपी) प्रमुख मुकेश सहनी अपने को सन् ऑफ मल्लाह कहलाना सम्मान समझते हैं।मल्लाह का सामुदायिक नाम  निषाद है,जिसके अंतर्गत मल्लाह,केवट, बिन्द, धीवर,रैकवार,बाथम,कश्यप,बियार, गोड़िया,तुरहा, किसान, सिंघाड़िया,मांझी आदि उपजातियां सम्मिलित हैं और लोधी भी इनके काफी करीब है।यह एक ऐसा जातीय समूह है जो कमोबेश पूरे प्रदेश फैला है।

जिसकी आबादी 16 प्रतिशत से अधिक है।निषाद गोरखपुर, वाराणसी,बस्ती,अयोध्या,मिर्जापुर,कानपुर,बरेली,आगरा,सहारनपुर,आज़मगढ़, लखनऊचित्रकूट मण्डल में काफी प्रभावी है।अलीगढ़,मुरादाबाद, देवीपाटन, झांसी,मेरठ मण्डल की दर्जनों सीटों पर प्रभावशाली हैं।भागीदारी संकल्प मोर्चा में आने से बड़ी ताकत बन जाएगी।विगत दिनों वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी, सुभासपा प्रमुख ओमप्रकाश राजभर,आसपा प्रमुख चंद्रशेखर रावण, भागीदारी संकल्प पार्टी प्रमुख प्रेमचंद प्रजापति व वीआईपी यूपी प्रमुख चौ. लौटनराम निषाद जिन्हें सामाजिक न्याय चिंतक व रणनीतिकार माना जाता है,के मिलने से उत्तर प्रदेश की राजनीति में सरगर्मी तेज़ हो गयी है।

मोटे तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन सभी दलों का उत्तर प्रदेश की हर सीट पर छोटा ही सही, लेकिन सियासी आधार है।आसपा,वीआईपी, जाप का पूरे प्रदेश में अच्छा जनाधार है।चन्द्रशेखर एक युवा चेहरा हैं,जिनका दलित युवाओं में अच्छी पकड़ है।सुभासपा का वाराणसी,गोरखपुर, आज़मगढ़, बस्ती मण्डल में अच्छा जनाधार है।जन अधिकार पार्टी अध्यक्ष बाबूसिंह कुशवाहा व राजकुमार सैनी,बाबूराम पाल का भी अपनी अपनी जाति में पकड़ मजबूत करने में जुटे हुए हैं।वीआईपी के प्रदेश अध्यक्ष चौ. लौटनराम निषाद  ने बताया कि अगले महीने पार्टी द्वारा वाराणसी, मिर्ज़ापुर, गोरखपुर, अयोध्या,प्रयागराज,आज़मगढ़, आगरा,सहारनपुर,बरेली,कानपुर मण्डल में 12 रैलियाँ की जाएंगी।बताया कि 97 व बुंदलेखंड, पश्चिम, मध्य व बृज क्षेत्र की 72 विधानसभा क्षेत्रों में निषाद(मल्लाह,केवट कश्यप,बिन्द,गोड़िया,रैकवार,मांझी,धीवर) निर्णायक हैं,जहाँ इस जाति समूह का वोटबैंक 40 हजार से 1.20 लाख तक है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों 'प्रेशर पॉलिटिक्स' का बोलबाला अपने चरम पर है। यूपी विधानसभा चुनाव 2022 में 6 महीने से भी कम का समय बचा है।तमाम राजनीतिक दल अपने सियासी समीकरणों को दुरुस्त करने में जुटे हुए हैं। लेकिन, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी  के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर ने सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा के सभी समीकरणों को गड़बड़ा दिया है।दरअसल, ओमप्रकाश राजभर ने उत्तर प्रदेश की करीब 10 छोटी राजनीतिक पार्टियों के साथ गठबंधन करते हुए 'भागीदारी संकल्प मोर्चा' का निर्माण कर दिया है।एम आई एम आई एम चीफ असदुद्दीन ओवैसी भी भागीदारी संकल्प मोर्चा के साथ जुड़ने के साथ ही 100 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की हुंकार भर चुके हैं।

भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल सुभासपा को राजभर समुदाय की राजनीति के लिए जाना जाता है।इस मोर्चा के अन्य सियासी दल भी कमोबेश समुदाय विशेष के वोटों पर ही अपना अधिकार जताते हैं। ओवैसी खुलकर मुस्लिम समुदाय की सियासत करने का दंभ भरते हैं। मोटे तौर पर अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन सभी दलों का उत्तर प्रदेश की हर सीट पर छोटा ही सही, लेकिन सियासी आधार है।भागीदारी संकल्प मोर्चा के ओमप्रकाश राजभर सत्ता में आने पर सूबे की सभी जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करने की बात कह चुके हैं। राजभर ने पांच साल में पांच मुख्यमंत्री और 20 उपमुख्यमंत्रियों का फॉर्मूला भी तैयार कर लिया है। लेकिन, कहीं न कहीं ये तमाम कवायद केवल 'प्रेशर पॉलिटिक्स' का ही हिस्सा लगती है।

दरअसल, सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव घोषणा कर चुके हैं कि वो किसी बड़ी पार्टी से गठबंधन नहीं करेंगे और छोटे दलों को अपने साथ लाएंगे। सपा के साथ फिलहाल जयंत चौधरी के नेतृत्व वाली आरएलडी,डॉ. संजय सिंह चौहान की जनवादी पार्टी(सोशलिस्ट),केशव देव मौर्य की महान दल से गठबंधन है।हालांकि, अखिलेश यादव अपने चाचा शिवपाल यादव के साथ भी सुलह के प्रयास कर रहे हैं।शायद सीट शेयरिंग पर बात नहीं बन पा रही है, तभी शिवपाल सिंह यादव कह रहे हैं कि वह काफी वक्त से अखिलेश से नहीं मिले हैं। वहीं, बसपा सुप्रीमो मायावती भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि उनकी पार्टी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में किसी पार्टी के साथ गठबंधन नहीं करेगी। जबकि कांग्रेसी इंतजार में है और फिलहाल एकला चलो के सिद्धांत पर चल रही है। 
भागीदारी संकल्प मोर्चा का प्रेशर पॉलिटिक्स गेम

भागीदारी संकल्प मोर्चा ने अभी तक सपा, बसपा या कांग्रेस के साथ सियासी गठबंधन से इनकार नहीं किया है। इस मोर्चा के दरवाजे सभी राजनीतिक दलों के लिए खुले हुए हैं।बस जरूरत है, तो अदद शानदार ‘ऑफर’ की। अब ये ऑफर प्रेशर पॉलिटिक्स के सहारे ही मिल सकता है, तो इन दलों ने फिलहाल इसी रणनीति पर चलने का मन बना लिया है। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश की राजनीति अभी कई हिचकोले खाएगी, इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नही है।भाजपा के सामने एक-एक सीट पर खुद को मजबूत करने में जुटे विपक्षी दल इन छोटे दलों को चाहते हुए भी नरअंदाज नहीं कर सकते हैं।
दरअसल, जिन छोटे दलों को लेकर सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा अपने सियासी समीकरणों को सुधारने की कोशिशों में लगे हैं।अगर इनमें से किसी भी दल को मिला ‘ऑफर’ थोड़ा सा भी कमजोर हुआ, तो उनके सामने भागीदारी संकल्प मोर्चा का दरवाजा खुला हुआ है। अगर ऐसा होता है, तो निश्चित तौर पर अभी कमजोर नजर आ रहा ये मोर्चा एक ठीकठाक ‘बारगेनिंग’ पोजीशन में पहुंच जाएगा।वीआईपी,आजाद समाज पार्टी जैसे नए सियासी दलों को इसका लाभ मिलना तय है।अगर तमाम छोटे सियासी दल एक ही जगह इकट्ठा हो जाते हैं, तो ‘संगठन में शक्ति’ का कहावत चरितार्थ हो सकती है।इस स्थिति में इन दलों से हाथ मिलाने वाले सियासी दल का फायदा होना तय माना जा सकता है।सपा व भाजपा इस समय प्रबुद्ध सम्मेलन के साथ साथ गई यादव पिछड़ी व अतिदलित जातियों को जोड़ने का अभियान शुरू कर दिए है।
सभी राजनीतिक दलों को चाहिए छोटे सियासी दलों का साथ
उत्तर प्रदेश के सभी बड़े राजनीतिक दलों (सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा) को इन छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों की जरूरत है।भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ थे. योगी सरकार में मंत्री भी रहे, लेकिन पार्टी विरोधी बयानबाजी के चलते सरकार और गठबंधन से बाहर हो गए थे। भाजपा की सहयोगी निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद भी उत्तर प्रदेश में खुद को उपमुख्यमंत्री बनाने की मांग पर अड़े हुए हैं। कहा जा सकता है कि निषाद पार्टी को अगर सही ‘ऑफर’ नहीं मिला, तो वो भी भागीदारी संकल्प मोर्चा में शामिल होकर उसकी ताकत बढ़ा सकते हैं। वीआईपी पार्टी बिहार में राजग के घटक दल है।यूपी में लॉन्चिंग के दिन ही मुकेश सहनी ने स्पष्ट कर दिया कि-“आरक्षण नहीं तो गठबंधन नहीं।” विगत दिनों एक बड़े चैनल की डिबेट में कहा कि आरक्षण केंद्र से ही मिल सकता है।भाजपा की सरकार आरक्षण दे सकती है।अगर आरक्षण नहीं दिया तो हमारा उत्तर प्रदेश में बीजेपी से गठबंधन नहीं होगा।समान बिचारधारा के दलों के साथ मिलकर या अकेले 165 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।यह भी कहा कि हम भाजपा,कांग्रेस, सपा,बसपा से गठबंधन नहीं करेंगे।उत्तर प्रदेश के सभी बड़े राजनीतिक दलों (सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा) को इन छोटी और क्षेत्रीय पार्टियों की जरूरत है
सपा के साथ भी समस्या कुछ ऐसी ही है।सत्ता में वापसी के लिए अखिलेश यादव पूरा जोर लगा रहे हैं कि भाजपा के सामने सबसे मजबूत विकल्प के तौर पर वो सपा को पेश कर सकें।लेकिन, छोटे दलों ने उन्हें पहले से ही टंगड़ी मार दी है। सीधा सा मतलब है कि अगर सपा को इस भागीदारी संकल्प मोर्चा से गठबंधन करना है, तो उनकी शर्ते माननी होंगी और ऐसा करने पर सीधा नुकसान सपा को होगा।
कहना गलत नहीं होगा कि उत्तर प्रदेश की रग-रग में बसी धर्म और जाति की राजनीति को पहचानते हुए ओमप्रकाश राजभर ने भागीदारी संकल्प मोर्चा के रूप में एक बहुत ही सटीक दांव खेला है। पांच मुख्यमंत्री और 20 उपमुख्यमंत्रियों का फॉर्मूला बनाने वाले ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि उन्होंने भाजपा से ही यह समीकरण सीखा है।इस स्थिति में भागीदारी संकल्प मोर्चा के ‘प्रेशर पॉलिटिक्स’ का ये नया गेम प्लान काफी कारगर नजर आता है।

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