कोई क्यों नहीं पूछता दिलीप साहब का धर्म

आर.के. सिन्हा

दिलीप कुमार के निधन से पूरा देश शोकाकुल है। उनकी मृत्यु के साथ ही देश ने अपने एक बुजुर्ग और सफलतम नायक को खो दिया है। वे सेक्युलर भारत के सबसे महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में एक थे। अखंड भारत के सुदूर पेशावर  से संबंध रखने वाले एक पठान परिवार का नौजवान युसूफ खान समावेशी मुंबई में अपने  पिता लाला गुलाम सरवर के साथ कुछ समय तक फलों का कारोबार करता है। पर उसकी दिलचस्पी कला और फिल्मों की तरफ है। उसे उस दौर में देविका रानी फिल्मों में अवसर देती हैं जब देश में सांप्रदायिकता का जहर पूरी तरह से घोला जा चुका था। ये 1945 के जमाने की हैं । याद रखें कि तब तक मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की मांग कर चुकी थी। सांप्रदायिक माहौल गरम हो चुका था I

rk sinha

युसूफ खान की उस दौर की फिल्मी दुनिया की चोटी की हस्ती देविका रानी से मुलाकात होती है। उनके लिये तीन फिल्मी नाम का सुझाव देते हैं, हिन्दी के लब्धप्रतिष्ठ कथाकार भगवती चरण वर्मा। वे नाम थे वासुदेव, दिलीप कुमार और जहांगीर। युसूफ खान अपने लिए “दिलीप कुमार” नाम का चयन करते हैं। उसके बाद से पूरी देश और दुनिया उन्हें दिलीप कुमार के नाम से ही जानती है। वे  एक्टिंग की दुनिया के प्रथम पुरुष के रूप में अपने को स्थापित करते हैं। देवदास, मुगले आजम, तराना, राम और श्याम, क्रांति, सौदागर जैसी दर्जनों  फिल्मों में अपने स्वाभिवक अभिनय से वे भारत के महानतम फिल्मी कलाकार के रूप में अपना नाम और स्थान सदा के लिए आरक्षित करवा लेते हैं।  भारत कभी दिलीप कुमार का मजहब जानने की चेष्टा नहीं करता। यही तो भारत की तासीर है। वे सबके नायक बनते हैं। अगर आप गुणी हैं तो आपका सम्मान तो होगा ही । फिर चाहे आप दिलीप कुमार हों या तबलावादक जाकिर हुसैन और फिल्मी एक्टर इऱफान खान हों या फिऱ हॉकी के महान फारवर्ड मोहम्मद शाहिद।

दिलीप कुमार और उनके परिवार की भी भारत के  प्रति निष्ठा भी कमाल की रही। देश का 1947 में बंटवारा हुआ। देश से हजारों-लाखों मुसलमान पाकिस्तान जाने लगे। दिलीप कुमार के पिता लाला गुलाम सरवर को पेशावर में रहने वाले संबंधियों ने खत भेजने चालू कर दिए कि वे मुंबई छोड़कर वापस घर आ जाएं। उनका परोक्ष रूप से कहना था कि वे मुंबई छोड़कर जिन्ना के बनाए इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान आ जाएं। पर गुलाम सरवर ने उन तमाम आग्रहों को सिरे से खारिज कर दिया। उनका कहना था कि अब वे भारत में ही रहेंगे। अब उनका भारत को छोड़ने का सवाल ही नहीं होता। यह सारा किस्सा दिल्ली साहब ने अपनी आत्मकथा “दि सब्स्टन्स एंड दि शैडो”  में विस्तार से बयां किया।  जरा एक काल्पनिक स्थिति पर गौर करें। क्या अगर उनके पिता बेहतर जिंदगी की तलाश में सपरिवार मुंबई नहीं आते तो वे इतनी बुलंदियों को छू पाते? कतई नहीं। मुंबई के समावेशी और पेशेवर संसार ने ही तो उनकी प्रतिभा को पहचाना। उन्हें भरपूऱ अवसर दिए।

दरअसल मुंबई का मुसलमान भी देश के शेष हिस्सों के मुसलमानों से अलग नजर आता है। साउथ मुंबई में ताज होटल के पीछे के शानदार मुहल्ले कोलाबा को देखिए। एक से बड़े एक शो-रूम,रेस्तरां, कॉफी शॉप और बड़ी कंपनियों के दफ्तर। किसी यूरोप के देश का हिस्सा लगता है कोलाबा। यहां यूरोपीय अंदाज की इमारतों की भरमार है । इधर ज्यूलरी और दूसरे अनेक शो-रूम मुसलमानों के हैं। ये इनके ऊपर लगे बोर्डों को पढ़कर समझ आ जाता है। यह जगह गेटवे ऑफ इंडिया से भी बिल्कुल करीब में है।

अब जुहू चलते हैं। जुहू बीच पर हिजाब पहने मुसलमान लड़कियों का वॉलीबाल खेलना तो सामान्य सी बात है। क्या आपने  देश के किसी अन्य शहर में किसी मुसलमान का बड़ा सा ज्वैलरी शो-रूम देखा है? क्या आपने किसी शहर में हिजाब पहनी लड़कियों को वॉलीबाल खेलते हुए देखा है? दिल्ली, यूपी और बिहारी मुसलमान तो बहुत अलग हैं मुंबई वालों से। दिल्ली की बाबू मानसिकता सबको नौकरी करने के लिए प्रेरित करती है। मुंबई का मिजाज बिजनेस का है। उसका असर सारे मुंबईकरों पर होता है। मुंबई में खोजा, मेमन और बोहरा मुसलमान के खून में बिजनेस करना है। ये नौकरी के बजाय बिजनेस करना पसंद करते हैं। ये सब मोटा बिजनेस करते भी हैं।

मुंबई में ही है सिप्ला फार्मा कंपनी। ख्वाजा अब्दुल हामिद ने 1935 में अंधेरी में अपनी सिप्ला की पहली फैक्ट्री लगाई थी। उसमें 4 जुलाई,1939 को महात्मा गांधी खुद आए थे। गांधी जी ने हामिद से कहा था कि वे जीवन रक्षक दवाओं पर लगातार शोध करें। सिप्ला अब देश की चोटी की फार्मा कंपनी है। अरबों रुपये का सालाना कारोबार है। सिप्ला के मौजूदा चेयरमेन वाई.के.हामिद कॉरपोरेट इंडिया का बेहद खास नाम है। इसी मुंबई में ही 1960 में स्थापित हो गई वार्कहर्ड फार्मा भी है।  इसकी मैन्यूफैक्टकिंग यूनिट भारत से बाहर ब्रिटेन,आयरलैंड, फ्रांस, अमेरिका में भी है। इसके चेयरमेन हबील खुराकीवाला फिक्की के भी चेयरमेन रह चुके हैं। मुंबई के मुसलमान हिंदी और उर्दू के अतिरिक्त गुजराती, कोंकणी और मराठी भी बोल रहे हैं। आप मरीन ड्राइव पर शाम को बोहरा मुसलमानों को टहलते हुए गुजराती में बात करते हुए देख सकते हैं। ये टोपी भी अलग- अलग तरह की पहनते हैं। बोहरा मुसलमानों की टोपी ऊंची होती है। हाजी अली दरगाह में लगे बोर्डो में गुजराती और हिन्दी भी पढ़ी जा सकती है।

मुंबई में हिजाब पहनकर महिलाएँ लक्जरी कारें  चला रही हैं। इनकी पहचान का हिस्सा है बुर्का और हिजाब। इन्हें आप जुहू के शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां जैसे शिव सागर में डोसा या वड़ा पाव के साथ इंसाफ करते हुए भी देख सकते हैं। तो इस तरह के समावेशी और धर्म निरपेक्ष महानगर में जीवन के लगभग 85 साल गुजरे दिलीप कुमार के। उनकी मृत्यु के बाद बहुत से लोग उनके जन्म स्थान पेशावर की तो बातें कर रहे हैं,पर कोई यह नहीं लिख रहा है कि अरब सागर के किनारे बसे मुंबई ने ही दिलीप कुमार को पहचाना, समझा और गढ़ा। वे भी देश हित के लिए लगातार सक्रिय रहे। देश पर जब संकट आया तो वे पीछे नहीं हटे। उन्होंने पंडित नेहरु से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक सबके साथ काम किया। वे मुंबई के शेरिफ से लेकर राज्य सभा के नामित सदस्य भी रहे। मुंबई में एक दौर में शेऱिफ का पद किसी अति सम्मानित नागरिक को ही दिया जाता था। उनके जनाजे में सब शामिल हुए। शामिल होने वालों से किसी ने भी उनका धर्म नहीं पूछा। यही तो भारत की विशेषता है।  

लेखक वरिष्ठ संपादक, स्तभकार और पूर्व सांसद हैं)

Post a Comment

0 Comments