विवाह संस्कार में ‘कन्यादान’ शब्द बदलना जरूरी, ‘परंपरा’ नहीं!

निर्भय सक्सेना, बरेली। नारी का सम्मान करना चाहिए हर समाज व व्यक्ति इस बात को हमेशा दोहराता रहा है। सभी चाहते हैं नारी का सम्मान होना चाहिए। आज हर दल नारी शक्ति को आरक्षण देने की बात कर रहा है पर जब पद देने की बात आती है तो सभी दल पीछे हट जाते हैं। आज भी नारी को संसद में उसके अनुपात में आरक्षण देने का मुद्दा संसद में भी लंबित चल रहा है। भाजपा की सरकार में भी मामला वर्षो से लंबित होना समझ से परे है।

सच्चाई यह है कि हम बातें बड़ी-बड़ी कर रहे हैं पर आज भी नारी को वह सम्मान, स्वाभिमान नहीं मिल पा रहा है जिसकी वह हकदार है। कुछ घरों में आज भी उसकी उपेक्षा हो रही है इसके लिए किसी एक को दोष देना गलत होगा। हमारी पुरातन व्यवस्था इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हाल यह है विवाह जैसे पवित्र कर्म में भी ‘कन्यादान’ शब्द के बदलाब के लिए हिन्दू समाज में कभी बहस नहीं छेड़ी गयी? जहां तक हिंदु समाज में विवाह जैसे पवित्र कार्य की बात है तो इसमें ‘कन्यादान’ जैसे रीति-रिवाज पर किसी को एतराज नहीं होगा। पर ‘कन्यादान’ जैसे शब्द को सभ्य समाज ही अब बदल सकता है। जब प्राचीन काल में नारी शिक्षा को प्रोत्साहन नहीं मिलता था। नारी घर में अपना जीवन व्यतीत करती थीं। आज 21 वीं शताब्दी में जब दुनिया के विकासशील एवं विकसित देशों में नारी अपनी उपस्थिति का अहसास करा रही हो तो विवाह जैसे संस्कार में ‘कन्यादान’ जैसे शब्द पर आज विचार तो करना ही होगा।
दहेज की बलिबेदी पर चढ़ने वाली हजारों विवाहितों का जीवन बचाने के लिए सदियों से चली आ रही विवाह के समय ‘कन्यादान’ करने के ‘शब्द’ परम्परा को अब बदलना ही होगा। इसके स्थान पर विवाह संस्कार में वंश बढ़त परंपरा के लिए ‘कन्या का अर्पण’ या ‘कन्या के हाथ पीले कर रहे हैं’ करने जैसे शब्द को प्रचलन में लाना ही उपयुक्त होगा और भी शब्द जागरूक समाज दे सकता है। इस ‘कन्यादान’ शब्द परम्परा को बदले जाने की आवश्यकता महसूस करने का मुख्य कारण यह है कि अधिकांश परिवार ‘कन्यादान’ की महत्ता को समझ नहीं पाते और जीती जागती महिला को तरह तरह से प्रताड़ित करते रहते हैं। बहुत से लोग तो दरिंदगी की हदें पार करते हुए विवाहित को मार डालते हैं। इस स्थिति में यह आवश्यक है कि ससुराल वालों को विवाह के समय ही बात का अहसास करा दिया जाये कि विवाहिता दान की चीज नहीं, सहभागिनी है। ससुराल बालों को उसका उसी तरह ध्यान रखना चाहिए जेसे अपने पुत्र या पुत्रियों का रखते हैं.
वैसे भी हमारे यहां विवाह को सम्बन्ध की संज्ञा दी गई है। संबंध का अर्थ समान बंधन से माना जाना चाहिए। अर्थात जो नियम ससुराल विवाहित पुत्र के लिए लागू होते हैं उनका वधु के संबंध में भी पालन किया जाये। यह तभी संभव है ससुराल विवाहित को ‘दान’ की वस्तु न मानकर अपना संबंधी मानें। इससे एक लाभ यह भी होगा कि समाज में नारी जाति का सम्मान व स्वाभिमान बरकरार रहेगा। यह किसी तरह उपयुक्त नहीं लगा किसी सुशिक्षित व सम्मानित जाब, वैज्ञानिक, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, सैन्य अधिकारी, पायलट, प्रशासनिक अधिकारी जैसे पद पर, में लगी युवती को दान में दे दिया जाये। बाल विवाह प्रचलित होने के समय जब गुड्डे-गुड़ियों को खेलने वाली बच्चियों का भले ही उपयुक्त माना जाता हो पर वर्तमान में जब कन्याएं शिक्षित होकर मर्दो के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हों। वहां उनका दान करना नारी के स्वाभिमान को कुचलना ही है। वैसे दान किसी वस्तु या चल-अचल सम्पत्ति का हो सकता है। ‘पुत्री रूपी कन्या’ कोई वस्तु अथवा चल/अचल संपत्ति नहीं है। यों तो ‘कन्यादान’ शब्द बेहद मार्मिक धार्मिक और हमारी पुरानी रूढिगत मान्यताओं का द्योतक है। अगर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ‘कन्यादान’ की शाब्दिक सार्थकता चर्चा का अहम मुद्दा है।
परिवार की धुरी जिन दो पहियों पर टिकी है यदि उनमें एक पुरुष है तो दूसरा नारी है। पारिवारिक जीवन की सफल दायित्व की पूर्ति उसी समय मुमकिन है जबकि पुरुष व नारी मिल-जुलकर अपने परस्पर पारिवारिक दायित्व का पालन करें। पिता अपनी पुत्री को इसी पारिवारिक दायित्व के निर्वहन के मद्देनजर अग्नि के समक्ष धार्मिक अनुष्ठन के मध्य जीवन सफर हेतु का मुद्दा हो जाती है कोरोनाकाल ने हमे समझा दिया यदि वक्त की रफ्तार के साथ चलना है तो हमें ऐसी पुरानी रूढ़िगत शाब्दिक मान्यताओं का बोझ अपने कंधे से उठा फेंकना होगा जो कि शाब्दिक तौर पर ही औचित्यहीन हो चुकी है।
हिंदू समाज में अगर ‘कन्यादान’ ऐसे ही जारी रखना है तो कबीलाई परंपरा की तरह ‘पुत्रदान’ की परंपरा को बढ़ावा देना होगा अन्यथा केवल ‘कन्यादान’ शब्द कहना हमारी नजर में बेमानी है। समाज में आज नारी का दर्जा पुरुष से कम नहीं है। कितना हास्यास्पद लगता है। जब हम पुत्री को पढ़ा-लिखा कर प्रशासनिक अधिकारी, पायलट, वकील, डाक्टर, वैज्ञानिक, इंजीनियर, जज, सेना अधिकारी आदि बनाते हैं। विवाह के समय हम उसी का ‘कन्यादान’ कर देते हैं।
कोरोनाकाल में इस भौतिकवादी युग में आज जहां चारों ओर बेहतर जिंदगी की चाह में हम कुंठित हो रहे हैं । उससे हमारा समाज भी अछूता नहीं रहा है। हर समाज दहेज रूपी दानव की चपेट में फंसकर आज बाहर निकलने की चाह में छटपटा रहा है। इस दिशा में सामूहिक विवाह एवं ‘परिचय सम्मेलन’ ने समाज को अच्छे संकेत दिये हैं। युवा पीढ़ी पर जिम्मेदारी है कि वह हिन्दु समाज को इस दिशा में जाग्रत करने का बीड़ा उठाये।

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