बचपन में पिता गुजरे, जवानी में एकलौते बड़े भाई, पर परिवार की एकता ने बनाया देश का प्रसिद्ध मैथेमैटिक्स गुरू

पटना। हर साल 15 मई को परिवार की अहमियत बताने के मकसद से अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है।

आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी (Life) में परिवार (Family) की अहमियत और भी बढ़ जाती है।  समाज की परिकल्पना परिवार के बिना अधूरी है। ऐसे में परिवार ही हैं जो लोगों को एक दूसरे से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। परिवार हमारे रिश्‍तों को न सिर्फ मजबूती देता है, बल्कि हर गम और खुशी के मौके पर हमारे साथ खड़ा भी होता है, यही वजह है कि हमारे जीवन में परिवार का बहुत महत्‍व है। आज के इस आधुनिक जीवन में भी परिवार की अहमियत कम नहीं हुई है।

आधुनिक समाज में परिवारों का विघटन तेजी से हो रहा है। ऐसे में परिवार एकजुट रहें और खासतौर पर युवा इसके महत्‍व को समझें यही अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस मनाने की अहम वजह है, आज रोजगार के लिए पलायन, एकल परिवार को महत्‍व दिए जाने आदि कारणों से संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय परिवार दिवस का मूल उद्देश्य युवाओं को परिवार के प्रति जागरूक करना है।

बचपन में पिता गुजरे,जवानी में एकलौते बड़े भाई उसके बाद आरके श्रीवास्तव पूरी तरह टुट चुके थे फिर माँ और भाभी के हौंसले ने आरके श्रीवास्तव के सपने को उड़ान दी। 

आज देश के टॉप 10 शिक्षको में बिहार के आरके श्रीवास्तव का नाम आता है जिनके शैक्षणिक कार्यशैली को लोग खुब पसंद करते है। जब आरके श्रीवास्तव 5 वर्ष के थे तभी उनके पिता पारस नाथ लाल इस दुनिया को छोड़ कर चले गये। 

बड़े भाई शिवकुमार श्रीवास्तव को बहुत कम उम्र में ही परिवार चलाने का दायित्व आ गया, बहन की शादी से लेकर भाई को पढ़ाने तक का, पिता के गुजरने के कुछ वर्षो के बाद आरके के बड़े भाई ने आपसी सहयोग से पैसा इकट्ठा कर एक ऑटो  रिक्शा खरीदा। 

उसी ऑटो रिक्शा से जो इनकम दिनभर का आता था तो परिवार का भरण पोषण होता था। धीरे-धीरे समय बीतते गया और परिवार कम पैसे में भी खुशहाल जीवन जीने लगा, इसका मुख्य कारण था सभी का आपस में प्रेम। 

आरके श्रीवास्तव के बड़े भाई ने माँ और पत्नी के सलाह से बड़ी बहनो की शादी शिक्षित परिवार में किया। अब आरके श्रीवास्तव भी बड़े हो चुके थे, उनके बड़े भाई का सपना था की मेरा भाई को खुब पढाना-लिखाना है। लेकिन समय का चक्र ने एक दिन आरके श्रीवास्तव के बड़े भाई को उनसे छीन लिया। 

बड़े भाई आरके श्रीवास्तव को अपने बेटे बेटियो से भी अधिक प्यार करते थे। बड़े भाई के गुजरने के बाद आरके श्रीवास्तव पुरी तरह टुट चुके थे उनके ऊपर तीन भतीजियो  को पढाने और उनके शादी का दायित्व और भतीजे के सपने को पंख लगाने का दायित्व कम उम्र में ही आ गया। 

फिर माँ आरती देवी और भाभी संध्या देवी के हौसले के बल आरके श्रीवास्तव आगे बढने लगे।परिवार के लोगो का काफी सपोर्ट के बल उनके शैक्षणिक कार्यशैली में बल मिलने लगा। समय ने एक बार उस परिवार को फिर से अच्छी स्थिति में ला दिया। 10 जून 2017 को आरके श्रीवास्तव ने परिवार के सलाह से अपने बड़ी भतीजी की शादी शिक्षित सम्पन्न परिवार में किया।  

आज आरके श्रीवास्तव का नाम उनके शैक्षणिक कार्यशैली के लिये वर्ल्ड बुक ऑफ रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चूका है। आरके श्रीवास्तव अपने सफलता का श्रेय पापा और भैया का दिये गये संस्कार और माँ- भाभी के द्वारा प्राप्त संस्कार और उनके द्वारा दिये गये हौसले को बताते है।

आरके श्रीवास्तव ने नई पीढ़ी को सलाह दी कि आप सभी परिवार के मह्त्व को समझे और उन्होंने बताया की संयुक्त परिवार में  आपसी प्रेम और लगाव बेहतर हो तो उससे बड़ी खुशी कहीं नहीं है। 

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