जैसी की तैसी रही, भारतेंदु की पीर, निज भाषा के पांव में, अब तक है जंजीर

बरेली। साहित्यिक संस्था शब्दांगन, बरेली के तत्वावधान में हिंदी पाक्षिक पर्व पर एक काव्यगोष्टि का प्रारंभ दिनेश पवन ने मां शारदे की मूर्ति पर माल्यार्पण से किया । डा. दीपांकर गुप्ता ने सरस्वती वंंदना प्रस्तुत कर वातावरण हिंदीमय कर दिया।

महामंत्री इंद्र देव त्रिवेदी के आवास बिहारीपुर खत्रियान पर कार्यक्रम के मुख्य अतिथि कवि दिनेश पवन थे और अध्यक्षता नवगीतकार रमेश गौतम थे । विशिष्ट सहयोग सुरेंद्र बीनू सिन्हा ने किया।

कार्यक्रम में सर्वप्रथम रमेश गौतम ने हिंदी भाषा पर वक्तव्य देते हुए कहा कि हिंदी की स्वीकार्यता पूरे विश्व में बढ़ती ही जा रही है । अंग्रेजी और मंदारिन के बाद हिंदी ही सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है । श्री गौतम ने ” मां अक्षरा “नामक गीत सुनाकर भावविभोर कर दिया । आज भारतेंदु हरिश्चंद्र के जन्मदिन पर उनको याद करते हुए चिंता भी व्यक्त की –
” जैसी की तैसी रही, भारतेंदु की पीर।
निज भाषा के पांव में, अब तक है जंजीर ।।”
डा. दीपंकर गुप्ता की रचना भी खूब पसंद की गई –
” हिंदी की जयकार करें हम ।
सच्चे मन से याद करें हम ।
जो भारती भाल की बिंदी
हिंदी में व्यवहार करें हम ।।”

रामकुमार अफरोज ने हिंदी की ग़ज़ल सुनाकर समां बांध दिया । यह पंक्तियाँ सराही गईं –
” दुनिया भर में हैं अफरोज़ ।
हिंदी के शुभचिंतक भी ।।”
श्री राम प्रकाश सिंह ओज ने एक मुक्तक पढ़कर हिंदी का यूं गुणगान किया –
” जन – जन में है लोकप्रिय, यह मुझे विश्वास है ।
बहुत कोमल ह्रदय भावन , शहद सी मिठास है ।
सारे जग की भाषाओं में है, श्रेष्ठ हिंदी,
तभी तो मेरे ह्रदय में इसका निवास है ।।”
अपना गीत प्रस्तुत करते हुए संचालक इंद्र देव त्रिवेदी ने संविधान की 22 भाषाओं को लेकर गीत पढ़ा-
” भारत की सब भाषाओं का राग सुनाती है हिंदी ।
प्रखर रश्मियां लुटा – लुटाकर, मोद मनाती है हिंदी ।।”
विशिष्ट वक्ता सुरेंद्र बीनू सिन्हा ने हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने की मांग करते हुए कहा कि हिंदी भारत की अस्मिता और संस्कृति की भाषा है, जिसका सभी को सम्मान करना चाहिए।
आयोजन में हिंदी भाषा के उत्थान पर विचार सर्वश्री दिनेश पवन, लोकतंत्र सेनानी विनोद कुमार गुप्ता, निर्भय सक्सेना, अलका त्रिवेदी और राधिका खन्ना ने भी व्यक्त किए । संचालन इंद्र देव त्रिवेदी एवम आभार निर्भय सक्सेना ने व्यक्त किया।

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