गरीबों को नहीं भूलते मुसलमान, हर त्यौहार में मिलता है बराबर का दर्जा

लखनऊ। मुसलमानों के प्रमुख त्यौहारों में से एक ईद उल अज़हा जिलहिज्जा की दसवीं तारीख को मनाया जाता है। मुस्लिम धर्म में कुर्बानी का अर्थ खुद को खुदा के नाम पर कुर्बान कर देना यानि अपनी सबसे प्यारी चीज का त्याग करने की भावना को उजागर करता है। 

ईद उल अज़हा को हम बकरीद के नाम से भी जानते हैं। जैसा की सभी जानते हैं इस्लाम धर्म में गरीबों को कभी नहीं भूला जाता। उसी प्रकार यह त्यौहार भी गरीबों को शामिल किए बगैर पूरा नहीं होता।

ईद उल अज़हा मनाने के पीछे भी एक कहानी है जो दिल को छू जाती है। हजरत इब्राहिम अलै: द्वारा अल्लाह के हुक्म पर अपने इकलौते बेटे की कुर्बानी देने के लिए तत्पर हो जाने के दिन से इस त्यौहार की शुरूआत हुई। बताया जाता है कि हजरत इब्राहीम अलै: से एक ख्वाब में उनकी सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने के लिए कहा गया। हजरत इब्राहीम को लगा कि उन्हें सबसे प्रिय तो उनका बेटा है। इसलिए उन्होंने अपने बेटे की कुर्बानी देना स्वीकार किया। इस दौरान शैतान ने उन्हें तरह-तरह से बहकाने की कोशिश की।

हजरत इब्राहीम को लगा कि कुर्बानी देते समय कहीं उनकी भावनाएं आड़े आ सकती हैं। इसलिए उन्होंने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली। इसके बाद जब उन्होंने कुर्बानी के लिए बेटे की गर्दन पर छुरी चलायी तो छुरी की धार खत्म हो गयी। काफी प्रयत्न के बाद भी छुरी उनके बेटे की नरम गर्दन को नहीं काट सकी। तभी उनके बेटे की जगह एक दुम्बा जन्नत से जिबरील अलैह: लाये और उसकी कुर्बानी की गयी। तभी से बकरीद मनाना शुरू किया गया। 

नबी करीम सल. फरमाते हैं कि कुर्बानी के जानवर के खून का कतरा जमीन पर गिरने से पहले ही कुर्बानी करने वाले इंसान को इसका अज्र मिल जाता है। इस्लाम धर्म के अनुसार कुर्बानी के  मीट को तीन बराबर हिस्सों में बांटा जाता है। पहला हिस्सा अपने लिए, दूसरे दोस्तो-रिश्तेदारों के और तीसरा गरीबों व मिस्कीनों के लिए। ईद उल फितर की तरह ही ईद उल अज़हा पर भी गरीबों को नजरअंदाज नहीं किया जाता। कुर्बानी हर उस शख्स पर वाजिब है जो कुर्बानी करने के योग्य है। गरीब व यतीम इस श्रेणी में नहीं आते।

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