शबनम को होगी फांसी, ओह शबनम! तू ही बता कैसे माफ कर दें तुझे!

अजय यादव, अमरोहा की गलि‍यों से मां-बाप, भाई-भाभी व दस माह के भतीजे समेत सात अपनों का ही गला काटकर हत्या करा देनी वाली शबनम को माफी नहीं मि...

अजय यादव, अमरोहा की गलि‍यों से
मां-बाप, भाई-भाभी व दस माह के भतीजे समेत सात अपनों का ही गला काटकर हत्या करा देनी वाली शबनम को माफी नहीं मिलेगी। फांसी पर लटकना तय सा ही है। 

प्रेम की पवित्रता पर मीना कुमारी अभिनीत पाकीजा फ़िल्म बनाने वाले कमाल अमरोही का पुश्तैनी घर शबनम के गांव बावनखेड़ी और मेरे गांव फ़ौलादपुर के करीब बीच मे है। दोनों गॉंव करीब पैंतीस किमी दूर हैं। जब यह कांड हुआ था 14 अप्रैल 2008 को, तब मैं झांसी में था, अमर उजाला में, रिपोर्टर। टीवी अखबारों से ही पढ़ा सुना। मुख्यमंत्री मायावती भी गांव गईं। अमरोहा चर्चा में आया, घटना से मेरा कोई वास्ता नहीं था, सिवाए अमरोहा के नाम के, फिर भी दुखी हुआ, शर्मिंदा भी। संपादक वंशीधर मिश्र जी और एक दो लोग थे, जो जानते थे, मैं अमरोहा से हूं, अन्यथा बाकी को कोई खास मतलब रहता नहीं है। मैंने भी ज्यादा जिक्र नहीं किया, बताने लायक बात भी नहीं थी। मेरे जिले की जमीन में ऐसे क्रूर पुरूष भी नहीं होने चाहिए, एक महिला कैसे हो गई, इतनी बुरी! 

अमरोहा से दि‍ल्‍ली तक बरकरार रहा फांसी का फैसला  
समय बीतता गया। शबनम-सलीम अखबारों में छपते रहे, दोनों को फांसी की सजा सुनाई गई, अमरोहा से ही। दिल्ली तक फैसला बरकरार रहा। फिर माफी मांगने का सिलसिला चला। मैं समझ नहीं पा रहा हूं, ये जीना क्यों चाह रहे हैं, न इन्हें, न निर्भया कांड वालों को। इस देश में इतने लोग आत्महत्या कर रहे हैं, उन्हें समझाना-रोकना मुश्किल हो रहा है, काउंसिलिंग होती है, मत मरो भैया। और इधर, ये हैं कि इन्हें पूरा देश, सरकार, कानून, चाह रहे हैं कि मर जाएं और ये अकेले सिर्फ जीना भर चाह रहे हैं, चाहे सलाखों में ही क्यों न जिएं। निर्भया कांड वालों को पहली फुर्सत मार दिया जाना चाहिए, सभी ऐसा कह रहे हैं, क्योंकि उन्होंने सिर्फ हवस के लिए ऐसा किया और यह बड़ी जानवरी दुष्प्रवृत्ति और समस्या है। इनके साथ हैदारबादी न्याय जैसा कुछ हो जाए, तब भी किसी को एतराज नहीं होगा, शायद।

उस रात के बाद सबकुछ बदल गया, लोगों की सोच भी 
मगर, ट्विस्ट यह देखिए, कि शबनम को लेकर वही हैदराबादी न्याय रिलैक्स हो जाता है। इस मजबूर तर्क के साथ कि शबनम ने हवस में नहीं, बल्कि इश्क में यह सब किया था। मैं कभी शबनम से नहीं मिला, सलीम से मिलने की तो कोई वजह भी नहीं थी। पर, जब अमरोहा लौटा कई वर्षों बाद। दैनिक जागरण अमरोहा का ब्युरो चीफ बनकर। उसी दौरान फिर से तत्कालीन राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी ने शबनम की दया याचिका खारिज कर दी। सच, बताऊं, मुझे अच्छा नहीं लगा। मैं स्टोरी के लिए बावनखेड़ी गया। उस कतलगाह घर भी। पूरा पैकेज, एक पेज का दिया। एक स्टोरी भी बाइलाइन दी, दरअसल, मैं उसी स्टोरी के लिए ही गया भी था। क्या, नफी (माइनस) में भी गुंजाइश है, जो शबनम को बस इतना माफ किया जा सके, कि वो जेल में ही सही, जिंदाभर रह जाए, अपने बेटे के लिए, या बेटे के नाम पर। वह बच्चा ताज बहुत खूबसुरत है, मेरा फेसबुक फ्रेंड भी है, अब। गांव में सबसे मिला, चाचा से, ताउ से, अड़ोसी पड़ोसी, जो भी हैं, सबने कहा बहुत अच्छी लड़की थी शबनम, शिक्षामित्र थी। मगर, उस रात के बाद सब कुछ बदल गया, सोच भी।

अभी भी उतनी ही नफरत है शबनम से ..
उनसे मैंने फिर पूछा, कि क्या इतने सालों बाद भी, अभी भी उतनी ही नफरत है शबनम से। क्या माफ नहीं हो सकती शबनम, आपकी तरफ से। यकीं करो, वे सब मुझ पर चढ़ बैठे। ज्यादा ही गुस्सा था। हालांकि गुस्से की कुछ वजहें और भी हैं। जाति, बिरादरी, नाक-मूंछ, धन-दौलत, जमीन जायदाद जैसी। फिलहाल, वह अखबार की कटिंग तो मेरे पास नहीं है, तब मैं फेसबुक ज्यादा नहीं चलाता था, पर स्टोरी का शीर्षक यही था कि शबनम तु ही बता कैसे माफ कर दें तुझें। प्रेम, गुस्सा, लाचारी सब कुछ था इसमें।

शबनम सि‍र्फ जि‍ंदाभर रह जाए
आज फिर वही यादें। मगर, अब मैं थोड़ा खुल रहा हूं, खुल कर लिख रहा हूं। निर्भया कांड वाले कड़ी सजा पाने चाहिए, नजीर होनी चाहिए। मगर शबनम कांड उनके जैसा नहीं है, पूरा मामला, पूरे हालात, पूरी भावनाएं, पूरी मनोदशा ही अलग हैं। मान लो, शबनम सिर्फ जिंदा भर रह जाए तो समाज का कौन सा नुकसान हो जाएगा। कौन सा खराब मैसेज समाज में चला जाएगा, वह हार तो चुकी ही है पूरी, कई बार, टूट भी चुकी है। समाज, सरकार या कानून इससे ज्यादा उसे क्या हरायेंगे, क्या तोडेंगे। क्या खत्म कर देंगे उसका, केवल शरीर, जो अब कुछ भी करने की स्थिति में ही नहीं है। 

नजीर के लि‍ए जि‍ंदा रखी जाए शबनम 
मान लो, वह जिंदा भी रह जाए, तब भी क्या कोई भी लड़की उससे प्रेरणा लेकर शबनम जैसा बनना चाहेगी, या बनकर जिंदा रहना चाहेगी। मैं पूरे दावे से तो नहीं कर रहा हूं, लेकिन यदि शबनम को आजाद कर दिया जाये, तो एक दिन वह खुद आत्महत्या कर लेगी, इतने ताने मिलेंगे, क्योंकि हमारा समाज अपने आप में बहुत बेहतरीन न्याय व्यवस्था भी है। मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि उसे छोड़ दो, बल्कि यह कह रहा हूं कि देहप्रेम आकर्षण के सबसे कुटिल प्रयोग और उसके असफल प्रमाण के लिए उसे जिंदा रखा जाना चाहिए, सलाखों में ही सही। सब जानते हैं, उसे मारना कोई समस्या, कोई मुद्दा नहीं है, बंधी बन्धाई एक लड़की, रस्सी के एक झटके से जल्लाद उसे यूं ही खत्म कर देगा। 

बेशक, एक रात के लिए पागल हुई लड़की को जिंदा रखना समस्या हो सकती है, लेकिन यह समस्या कम, चुनौती ज्यादा है। शायद, मेरे विचार से समाज और सरकार को यह चुनौती स्वीकारनी चाहिए। परिणाम क्या होंगे, अभी नहीं पता। लेकिन इतना पता है, इससे न तो हम छोटे हो जाएंगे, न कमजोर कहलाएंगे। क्योंकि यह कई बार सिद्ध हो चुका है, कि हम शबनम से तो बहादुर हैं।

कौन रोक सकता था इस अपराध को 
मैं सलीम का पक्षधर अभी भी नहीं हूं, क्योंकि अगर वह साथ देने से मना कर देता, तो शायद शबनम ऐसा नहीं करती। अंततः यही कहूंगा कि, चाहो तो, शबनम को मार दो, मगर फिर भी कुछ सवालों को जरूर जिंदा रखा जाना चाहिए, और वे रहेंगे भी, आप उन्हें मार भी नहीं सकते। कि प्रेम क्या है, आकर्षण क्या है, प्रेम में पागलपन क्या है ? एसिड अटैक क्यों होता है ? कैसे जी पाती हैं वे लड़कियां? क्या ऐसा प्रेम भी हो सकता है, जिसमें अपनों की हत्याएं करने का उकसावा हो? इसकी जरूरत क्यों है, क्यों दोनों की शादी नहीं हो सकती थी, कौन रोक सकता था और क्यों ?

शबनम को था अपना घर न बस पाने का डर
और यह भी कि हमारी दया का पैमाना क्या है ? हम सेना के लिए एक एक जवान को तैयार करते हैं, ताकि वह दस बीस को मार सके। न तो मरने वाला, न मारने वाला, एक दूसरे को जानते हैं, न किसी ने अनैतिक, अभद्र, अश्लील आचरण किया होता है। फिर बॉर्डर के दोनों तरफ हम मारने वालों को सम्मानित भी करते हैं, क्योंकि मरने वाले दुश्मन देश के होते हैं, उन गैरों से हमारा घर छिनने का डर होता है। शबनम को अपना घर न बस पाने का डर था, इसलिए उसने अपनों को ही मरवा दिया। अब सजा भी गैर तय कर रहे हैं, माफी भी वे देने या न देने के हकदार हैं, जिनसे शबनम का कोई दूर का भी वास्ता ही नहीं है। बाकी सब तमाशबीन हैं, मेरी तरह से, जिनकी राय भी कोई मायने नहीं रखती या फिर दायरों में बंधी है। फिर भी सोचिए, क्या प्रेम, ईर्ष्या, नफरत, दया, क्षमा दायरों में बंधकर रह सकती हैं ? ये हैं क्या बलाएं ? जिस दिन आदम जात इन बलाओं को समझ लेगी, उस दिन से शबनम, शबनम (औंस की बूंद) ही रहेंगी, वे किसी सलीम के आकर्षण में नहीं फसेंगी। बस, इतना ही कहना था, इतनी ही जरूरत है।

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शबनम को होगी फांसी, ओह शबनम! तू ही बता कैसे माफ कर दें तुझे!
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